रोजगार गारंटी में सुधारः भावनाओं के बजाय तथ्यों पर आधारित हो बहस-शैलेश कुमार सिंह

लोकतंत्र में लोकनीति पर सार्वजनिक बहस स्वाभाविक ही नहीं, बल्कि जरूरी भी है। आजीविकाओं (खास तौर से ग्रामीण परिवारों के लिए) को आकार देने वाले कानूनों की कड़ाई से समीक्षा की ही जानी चाहिए। लेकिन इस तरह की समीक्षा नए कानून के प्रावधानों के सावधानी पूर्वक अध्ययन पर आधारित होनी चाहिए। यह पिछले फ्रेमवर्क से … Continue reading रोजगार गारंटी में सुधारः भावनाओं के बजाय तथ्यों पर आधारित हो बहस-शैलेश कुमार सिंह